वर्ल्ड कप के लिए 15 सदस्यीय टीम में जगह नहीं बना पाने वाले अंबाति रायुडू ने कुछ घंटे पहले एक ट्वीट किया है और उनका ये ट्वीट सोशल मीडिया
में चर्चा का विषय बना हुआ है.
अंबाति रायुडू ने अपने ट्वीट में लिखा है, "वर्ल्ड कप देखने के लिए अभी अभी थ्री डी चश्मे का सेट ऑर्डर किया है."
इसके बाद उनके इस ट्वीट पर ढेरों लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
दरअसल, सोमवार को वर्ल्ड कप की टीम का एलान होने से पहले माना जा रहा था कि अंबाति रायुडू की जगह पक्की है, उन्हें नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर टीम में जगह दी जा रही थी.
इसकी पुख्ता वजह भी थी, पिछली 20 इंटरनेशनल पारियों में 14 बार अंबाति रायुडू नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर खेले और इसमें उन्होंने एक शतक और दो अर्धशतक सहित 464 रन बनाए.
लेकिन टीम के मुख्य चयनकर्ता एमएसके प्रसाद ने टीम के ऐलान के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए कहा था, "2017 की चैंपियंस ट्राफी के बाद हमने नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर कई खिलाड़ियों को आजमाया. हमने रायुडू को भी कुछ मौके दिए. विजय शंकर थ्री डायमेंशनल हैं. वे बल्लेबाज़ी कर सकते हैं, गेंदबाज़ी कर सकते हैं और अच्छे फ़ील्डर हैं. हम उन्हें नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर देख रहे हैं."
इस पर सोशल मीडिया पर दिलचस्प प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.
सागर नाम के एक यूज़र ने एक मीम शेयर किया है, जिस पर लिखा है, 'क्या से क्या हो गया देखते देखते'
हिमांशु झा ने लिखा है, 'मेरी सलाह है कि हाइलाइट्स या सिर्फ स्कोरकार्ड देखना बंद कर दीजिए. पूरे मैच देखिए और फिर तय कीजिए कि टीम के लिए कौन फ़िट है. रायुडू उपयोगी खिलाड़ी नहीं हैं. जब विश्व कप इंग्लैंड में हो रहा है तो उनकी जगह नहीं बनती.'
जलियाँवाला बाग़ नरसंहार को व्यापक रूप से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है, जिसने "अंग्रेजी राज" का क्रूर और दमनकारी चेहरा सामने लाया, अंग्रेजी राज भारतीयों के लिए वरदान है, उसके इस दावों को उजागर किया.
कई इतिहासकारों का मानना है कि इस घटना के बाद भारत पर शासन करने के लिए अंग्रेजों के "नैतिक" दावे का अंत हो गया.
इस घटना ने सीधे तौर पर एकजुट राजनीति के लिए भारतीयों को प्रेरित किया, जिसका परिणाम भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति के रूप में देखा गया.
यहां तक की कहानी इतिहास के किताबों में दर्ज है. कैसे महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था, जिसके बाद मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में कई हिस्सों में बड़े पैमाने प्रदर्शन हुए और उसका परिणाम 13 अप्रैल 1919 के नरसंहार के रूप में दिखा.
इसकी तुलना में इस पूरे प्रकरण के दौरान केवल पांच अंग्रेज़ ही मारे गए थे.
पंजाब को अंग्रेजी हुकूमत का गढ़ माना जाता था, जो इस बात पर गर्व करता था कि उसने राज्य में कॉलोनियों और रेलवे का विकास कर वहां समृद्धि लाई. भारतीय सेना में यहां के लोगों का योगदान भी महत्वपूर्ण था.
हालांकि इस विकास के लिबास की आड़ में अंग्रेजी हुकूमत ने उन सभी उठने वाली आवाज़ों को क्रूरता से कुचलना चाहती थी और यह 1857 के विद्रोह, 1870 के दशक के कूका आंदोलन और साथ ही 1914-15 के ग़दर आंदोन के दौरान देखने को मिला.
लेफ्टिनेंट गर्वनर ओडायर का पंजाब प्रशासन 1919 से पहले ही निर्मम भर्ती की वजह से काफी अलोकप्रिय था.
1915 के गदर विद्रोह के बाद गंभीर दमनकारी नीतियां देखने को मिली. शिक्षित समूहों की आवाज दबाई जाने लगीं.
आयरलैंड की जमींदार पृष्ठभूमि से आने वाले ओडायर ब्रितानी औपनिवेश के अधिकारी वर्ग से जुड़े शिक्षित, लोगों, व्यापारियों और साहूकारों के ख़िलाफ़ सोच रखते थे. और वो किसी भी राजनीतिक असंतोष को पहले ही अवसर में कुचल देते थे.
जनरल ओ डायर को साल 1913 में पंजाब के लाला हरकिशन लाल के पीपुल्स बैंक की बर्बादी के लिए भी दोषी माना गया. इसके चलते लाहौर के व्यापारियों और ख़ासतौर पर शहरी इलाके में रहने वाले लोगों का सबकुछ लुट गया. उनकी सारी बचत पानी फिर गया. साल 1917-1919 के दरम्यान क़ीमतो में भारी उछाल आया. मज़दूरी के मानकों में गिरावट आ गई, निचले पायदान पर खड़े मज़दूर और पीछे धकेल दिये गए और इसका नतीजा ये हुआ कि कामगार और कारीगर घोर तंगी में घिर गए.
अंबाति रायुडू ने अपने ट्वीट में लिखा है, "वर्ल्ड कप देखने के लिए अभी अभी थ्री डी चश्मे का सेट ऑर्डर किया है."
इसके बाद उनके इस ट्वीट पर ढेरों लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
दरअसल, सोमवार को वर्ल्ड कप की टीम का एलान होने से पहले माना जा रहा था कि अंबाति रायुडू की जगह पक्की है, उन्हें नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर टीम में जगह दी जा रही थी.
इसकी पुख्ता वजह भी थी, पिछली 20 इंटरनेशनल पारियों में 14 बार अंबाति रायुडू नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर खेले और इसमें उन्होंने एक शतक और दो अर्धशतक सहित 464 रन बनाए.
लेकिन टीम के मुख्य चयनकर्ता एमएसके प्रसाद ने टीम के ऐलान के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए कहा था, "2017 की चैंपियंस ट्राफी के बाद हमने नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर कई खिलाड़ियों को आजमाया. हमने रायुडू को भी कुछ मौके दिए. विजय शंकर थ्री डायमेंशनल हैं. वे बल्लेबाज़ी कर सकते हैं, गेंदबाज़ी कर सकते हैं और अच्छे फ़ील्डर हैं. हम उन्हें नंबर चार बल्लेबाज़ के तौर पर देख रहे हैं."
इस पर सोशल मीडिया पर दिलचस्प प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.
सागर नाम के एक यूज़र ने एक मीम शेयर किया है, जिस पर लिखा है, 'क्या से क्या हो गया देखते देखते'
हिमांशु झा ने लिखा है, 'मेरी सलाह है कि हाइलाइट्स या सिर्फ स्कोरकार्ड देखना बंद कर दीजिए. पूरे मैच देखिए और फिर तय कीजिए कि टीम के लिए कौन फ़िट है. रायुडू उपयोगी खिलाड़ी नहीं हैं. जब विश्व कप इंग्लैंड में हो रहा है तो उनकी जगह नहीं बनती.'
जलियाँवाला बाग़ नरसंहार को व्यापक रूप से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है, जिसने "अंग्रेजी राज" का क्रूर और दमनकारी चेहरा सामने लाया, अंग्रेजी राज भारतीयों के लिए वरदान है, उसके इस दावों को उजागर किया.
कई इतिहासकारों का मानना है कि इस घटना के बाद भारत पर शासन करने के लिए अंग्रेजों के "नैतिक" दावे का अंत हो गया.
इस घटना ने सीधे तौर पर एकजुट राजनीति के लिए भारतीयों को प्रेरित किया, जिसका परिणाम भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति के रूप में देखा गया.
यहां तक की कहानी इतिहास के किताबों में दर्ज है. कैसे महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था, जिसके बाद मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में कई हिस्सों में बड़े पैमाने प्रदर्शन हुए और उसका परिणाम 13 अप्रैल 1919 के नरसंहार के रूप में दिखा.
इसकी तुलना में इस पूरे प्रकरण के दौरान केवल पांच अंग्रेज़ ही मारे गए थे.
पंजाब को अंग्रेजी हुकूमत का गढ़ माना जाता था, जो इस बात पर गर्व करता था कि उसने राज्य में कॉलोनियों और रेलवे का विकास कर वहां समृद्धि लाई. भारतीय सेना में यहां के लोगों का योगदान भी महत्वपूर्ण था.
हालांकि इस विकास के लिबास की आड़ में अंग्रेजी हुकूमत ने उन सभी उठने वाली आवाज़ों को क्रूरता से कुचलना चाहती थी और यह 1857 के विद्रोह, 1870 के दशक के कूका आंदोलन और साथ ही 1914-15 के ग़दर आंदोन के दौरान देखने को मिला.
लेफ्टिनेंट गर्वनर ओडायर का पंजाब प्रशासन 1919 से पहले ही निर्मम भर्ती की वजह से काफी अलोकप्रिय था.
1915 के गदर विद्रोह के बाद गंभीर दमनकारी नीतियां देखने को मिली. शिक्षित समूहों की आवाज दबाई जाने लगीं.
आयरलैंड की जमींदार पृष्ठभूमि से आने वाले ओडायर ब्रितानी औपनिवेश के अधिकारी वर्ग से जुड़े शिक्षित, लोगों, व्यापारियों और साहूकारों के ख़िलाफ़ सोच रखते थे. और वो किसी भी राजनीतिक असंतोष को पहले ही अवसर में कुचल देते थे.
जनरल ओ डायर को साल 1913 में पंजाब के लाला हरकिशन लाल के पीपुल्स बैंक की बर्बादी के लिए भी दोषी माना गया. इसके चलते लाहौर के व्यापारियों और ख़ासतौर पर शहरी इलाके में रहने वाले लोगों का सबकुछ लुट गया. उनकी सारी बचत पानी फिर गया. साल 1917-1919 के दरम्यान क़ीमतो में भारी उछाल आया. मज़दूरी के मानकों में गिरावट आ गई, निचले पायदान पर खड़े मज़दूर और पीछे धकेल दिये गए और इसका नतीजा ये हुआ कि कामगार और कारीगर घोर तंगी में घिर गए.
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